विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्।
प्रधानविनियोगज्ञ: परं ब्रह्मानुपश्यति॥ १५॥
अनुवाद
जो मनुष्य पंचतन्मात्र, मन और बुद्धि को सनातन जानता है और छहों इन्द्रियों अर्थात् ऐश्वर्यों से युक्त महेश्वर का ज्ञान प्राप्त करके यह जान लेता है कि यह सम्पूर्ण जगत् त्रिगुणात्मक प्रकृति का परिणाम है, वह परब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है॥15॥
One who knows the Panchatanamtra, mind and intellect as eternal and by attaining the knowledge of Maheshwar with six organs i.e. the opulences, realizes that this entire world is the result of the triple nature, he realizes the Supreme God. 15॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥