श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 253: स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.253.11 
महोष्मान्तर्गतश्चापि गर्भत्वं समुपेयिवान्।
दश मासान् वसन् कुक्षौ नैषोऽन्नमिव जीर्यते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
(यह बड़े आश्चर्य की बात है कि) गर्भ-स्थिति को प्राप्त हुआ जीवात्मा दस महीने तक माता के गर्भ में रहता है और जठराग्नि की तीव्र गर्मी से पीड़ित होता है, फिर भी वह अन्न की तरह पचता नहीं है ॥11॥
 
(It is a matter of great astonishment that) the soul, which has attained the state of womb, lives in the mother's womb for ten months and is tormented by the intense heat of the gastric fire, but still it is not digested like food. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)