श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 253: स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.253.10 
प्रीणितश्चापि भवति महतोऽर्थानवाप्य हि।
करोति पुण्यं तत्रापि जीवन्निव च पश्यति॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ भी वह महान धन पाकर सुखी होता है और पुण्य कर्म करता है; इतना ही नहीं, वह स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था के समान ही सब कुछ देखता है॥10॥
 
There too he becomes happy on getting great wealth and performs pious deeds; not only this, he sees all things in his dreams as in the waking state.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)