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mahabharat 12.252.3: आकाश गुहारूप है और श्रवणेन्द्रिय दिव्य है। जो मनुष्य शरीर-रचना के नियमों को जानता है, वह आकाश के गुणों को जानता है ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.252: शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 252: शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.252.3 
अन्तरात्मकमाकाशं तन्मयं श्रोत्रमिन्द्रियम्।
तस्य शब्दं गुणं विद्यान्मूर्तिशास्त्रविधानवित्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
आकाश गुहारूप है और श्रवणेन्द्रिय दिव्य है। जो मनुष्य शरीर-रचना के नियमों को जानता है, वह आकाश के गुणों को जानता है ॥3॥
 
The sky is in the form of a recess and the organ of hearing is celestial. A person who knows the laws of anatomy knows the qualities of the sky. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)