Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.251.9: जैसे नदियों का जल सब ओर से परिपूर्ण और अचल स्थित समुद्र में बिना विक्षुब्ध हुए समा जाता है, वैसे ही स्थिर बुद्धि वाले पुरुष में सभी सुख बिना किसी विक्षुब्धता के प्रवेश कर जाते हैं। वह पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है और भोगों का आकांक्षी नहीं होता।॥9॥ | mahabharat अध्याय 12.251: ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणके लक्षण और परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकाम:॥ ९॥
अनुवाद
जैसे नदियों का जल सब ओर से परिपूर्ण और अचल स्थित समुद्र में बिना विक्षुब्ध हुए समा जाता है, वैसे ही स्थिर बुद्धि वाले पुरुष में सभी सुख बिना किसी विक्षुब्धता के प्रवेश कर जाते हैं। वह पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है और भोगों का आकांक्षी नहीं होता।॥9॥
Just as the waters of rivers merge into the ocean, which is full from all sides and has an unshakable position, without disturbing it, similarly, all pleasures enter a person of steady wisdom without causing any disturbance. That person attains supreme peace and is not a seeker of pleasures.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥