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mahabharat 12.250.4: मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही सबसे बड़ा तप है। इसे सभी धर्मों में सर्वश्रेष्ठ और परम धर्म कहा गया है। ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.250: परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 250: परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.250.4 
मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्रॺं परमं तप:।
तज्ज्याय: सर्वधर्मेभ्य: स धर्म: पर उच्यते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही सबसे बड़ा तप है। इसे सभी धर्मों में सर्वश्रेष्ठ और परम धर्म कहा गया है। ॥4॥
 
Concentration of the mind and the senses is the greatest penance. This is said to be the best and the ultimate religion of all religions. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)