Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.250.18: जैसे पर्वत शिखर पर खड़ा हुआ मनुष्य पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों को स्पष्ट रूप से देख सकता है, वैसे ही तुम भी ज्ञानरूपी शिला शिखर पर बैठकर समस्त प्राणियों की स्थिति को देखो। क्रोध और प्रसन्नता से रहित हो जाओ तथा बुद्धि की क्रूरता से भी मुक्त हो जाओ।॥18॥ | mahabharat अध्याय 12.250: परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भूमिष्ठानीव भूतानि पर्वतस्थो निशामय।
अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च न नृशंसमतिस्तथा॥ १८॥
अनुवाद
जैसे पर्वत शिखर पर खड़ा हुआ मनुष्य पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों को स्पष्ट रूप से देख सकता है, वैसे ही तुम भी ज्ञानरूपी शिला शिखर पर बैठकर समस्त प्राणियों की स्थिति को देखो। क्रोध और प्रसन्नता से रहित हो जाओ तथा बुद्धि की क्रूरता से भी मुक्त हो जाओ।॥18॥
Just as a man standing on the peak of a mountain can clearly see all the creatures living on the earth, similarly you too, sitting on the peak of the rock of knowledge, should look at the condition of all the creatures. Be free from anger and happiness and also be free from the cruelty of the intellect.॥18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥