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mahabharat 12.250.16-17: तू भी उस नदी को तैरकर पार कर जा, जिसे धीर, बुद्धिमान और तत्वदर्शी पुरुष पार कर जाते हैं। तू सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर, शांतचित्त, आत्मज्ञानी और शुद्ध बन। सद्बुद्धि (ज्ञान) का आश्रय लेकर तू सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर पापरहित और सुखी होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेगा।   |   mahabharat अध्याय 12.250: परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 250: परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  12.250.16-17 
यां तरन्ति कृतप्रज्ञा धृतिमन्तो मनीषिण:।
तां तीर्ण: सर्वतो मुक्तो विधृतात्माऽऽत्मविच्छुचि:॥ १६॥
उत्तमां बुद्धिमास्थाय ब्रह्मभूयान् भविष्यसि।
संतीर्ण: सर्वसंसारात् प्रसन्नात्मा विकल्मष:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तू भी उस नदी को तैरकर पार कर जा, जिसे धीर, बुद्धिमान और तत्वदर्शी पुरुष पार कर जाते हैं। तू सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर, शांतचित्त, आत्मज्ञानी और शुद्ध बन। सद्बुद्धि (ज्ञान) का आश्रय लेकर तू सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर पापरहित और सुखी होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेगा।
 
You should also swim across the river which is crossed by the patient, wise and philosophers. Become free from all kinds of bondages, become composed, self-aware and pure. By taking shelter of good wisdom (knowledge), you will be free from all kinds of worldly bondages and become sinless and happy and attain Brahmabhaav.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)