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mahabharat 12.25.5: व्यासजी बोले, "हे राजन! नष्ट हुई वस्तु न तो किसी कर्म करने से पुनः प्राप्त हो सकती है, न चिन्ता करने से। ऐसा कोई दाता नहीं है जो नष्ट हुई वस्तु को मनुष्य को लौटा सके। विधाता के विधान के अनुसार मनुष्य समय आने पर एक-एक करके सब कुछ प्राप्त कर लेता है॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.25: सेनजित् के उपदेशयुक्त उद्‍गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 25: सेनजित् के उपदेशयुक्त उद्‍गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.25.5 
व्यास उवाच
न कर्मणा लभ्यते चिन्तया वा
नाप्यस्ति दाता पुरुषस्य कश्चित्।
पर्याययोगाद् विहितं विधात्रा
कालेन सर्वं लभते मनुष्य:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले, "हे राजन! नष्ट हुई वस्तु न तो किसी कर्म करने से पुनः प्राप्त हो सकती है, न चिन्ता करने से। ऐसा कोई दाता नहीं है जो नष्ट हुई वस्तु को मनुष्य को लौटा सके। विधाता के विधान के अनुसार मनुष्य समय आने पर एक-एक करके सब कुछ प्राप्त कर लेता है॥5॥
 
Vyasa said, "O King! Neither can a destroyed object be recovered by doing any work, nor by worrying. There is no such giver who can return a destroyed object to a human being. According to the law of the Creator, a human being gets everything in time one by one. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)