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mahabharat 12.25.32: राजा के लिए युद्ध करना यज्ञ में दीक्षा लेने के समान है। राज्य की रक्षा करना और दण्डनीति में निपुण होना ही उसके लिए योग का साधन है। तथा यज्ञ में दक्षिणा के रूप में धन का त्याग करना और उत्तम रीति से दान देना ही राजा के लिए यज्ञ है। समझ लो कि ये तीन कर्म राजा को पवित्र करते हैं॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.25: सेनजित् के उपदेशयुक्त उद्‍गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 25: सेनजित् के उपदेशयुक्त उद्‍गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.25.32 
दीक्षां राज्ञ: संयुगे युद्धमाहु-
र्योगं राज्ये दण्डनीत्यां च सम्यक्।
वित्तत्यागो दक्षिणानां च यज्ञे
सम्यग् दानं पावनानीति विद्यात् ॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
राजा के लिए युद्ध करना यज्ञ में दीक्षा लेने के समान है। राज्य की रक्षा करना और दण्डनीति में निपुण होना ही उसके लिए योग का साधन है। तथा यज्ञ में दक्षिणा के रूप में धन का त्याग करना और उत्तम रीति से दान देना ही राजा के लिए यज्ञ है। समझ लो कि ये तीन कर्म राजा को पवित्र करते हैं॥ 32॥
 
For a king, fighting in a battle is equivalent to taking initiation in a sacrifice. Protecting the kingdom and being well established in the policy of punishment is the means of yoga for him. And sacrificing wealth as dakshina in a sacrifice and giving charity in the best manner is the sacrifice for a king. Understand that these three deeds purify a king.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)