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mahabharat 12.248.9: जब मनुष्य किसी वस्तु की इच्छा करता है, तब उसकी बुद्धि मन में परिवर्तित हो जाती है। इन्द्रियों की ये भावनाएँ, जो एक-दूसरे से पृथक हैं, बुद्धि का ही अंग समझना चाहिए। रूप आदि का ज्ञान 'मेधा' कहलाता है। इन्द्रियों को 'मेध्या' इसलिए कहा गया है क्योंकि वे उसमें हितकारी या सहायक होती हैं। योगी को सभी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.248.9 
यदा प्रार्थयते किंचित् तदा भवति सा मन:।
अधिष्ठानानि वै बुद्धॺां पृथगेतानि संस्मरेत्।
इन्द्रियाण्येव मेध्यानि विजेतव्यानि कृत्स्नश:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जब मनुष्य किसी वस्तु की इच्छा करता है, तब उसकी बुद्धि मन में परिवर्तित हो जाती है। इन्द्रियों की ये भावनाएँ, जो एक-दूसरे से पृथक हैं, बुद्धि का ही अंग समझना चाहिए। रूप आदि का ज्ञान 'मेधा' कहलाता है। इन्द्रियों को 'मेध्या' इसलिए कहा गया है क्योंकि वे उसमें हितकारी या सहायक होती हैं। योगी को सभी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए॥9॥
 
When a person desires something, his intellect transforms into the mind. These feelings of the senses, which are separate from each other, should be understood as part of the intellect only. The knowledge of form etc. is called 'Medha'. The senses are called 'Medhya' because they are beneficial or helpful in that. A yogi should conquer all the senses.॥9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)