Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.248.24: जैसे सरकंडे का काँटा उससे अलग होकर भी दोनों एक साथ रहते हैं, वैसे ही बुद्धि और क्षेत्रज्ञ एक दूसरे से सर्वथा अलग होकर भी एक साथ रहते हैं और एक दूसरे पर आश्रित रहते हैं ॥24॥ | mahabharat अध्याय 12.248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इषीका वा यथा मुञ्जे पृथक् च सह चैव च।
तथैव सहितावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ॥ २४॥
अनुवाद
जैसे सरकंडे का काँटा उससे अलग होकर भी दोनों एक साथ रहते हैं, वैसे ही बुद्धि और क्षेत्रज्ञ एक दूसरे से सर्वथा अलग होकर भी एक साथ रहते हैं और एक दूसरे पर आश्रित रहते हैं ॥24॥
Just as the thorn in the reed is separate from it, yet both remain together, similarly the intellect and the knower of the field, though completely separate from each other, remain together and dependent on each other. ॥24॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥