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mahabharat 12.248.20-21: आत्मा कभी बुद्धि की ओर और कभी गुणों की ओर प्रवृत्त होता है। गुण आत्मा को नहीं जानते, परन्तु आत्मा गुणों को सदैव जानता है, क्योंकि वह गुणों का द्रष्टा भी है और उसी प्रकार कर्ता भी। यद्यपि बुद्धि और क्षेत्रज्ञ दोनों सूक्ष्म पदार्थ हैं, परन्तु उनमें भेद इस प्रकार समझो: बुद्धि द्रष्टा है और आत्मा द्रष्टा है।॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  12.248.20-21 
सत्त्वमात्मा प्रसरति गुणान् वापि कदाचन।
न गुणा विदुरात्मानं गुणान् वेद स सर्वदा॥ २०॥
परिद्रष्टा गुणानां च परिस्रष्टा यथातथम्।
सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयो:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
आत्मा कभी बुद्धि की ओर और कभी गुणों की ओर प्रवृत्त होता है। गुण आत्मा को नहीं जानते, परन्तु आत्मा गुणों को सदैव जानता है, क्योंकि वह गुणों का द्रष्टा भी है और उसी प्रकार कर्ता भी। यद्यपि बुद्धि और क्षेत्रज्ञ दोनों सूक्ष्म पदार्थ हैं, परन्तु उनमें भेद इस प्रकार समझो: बुद्धि द्रष्टा है और आत्मा द्रष्टा है।॥ 21॥
 
The soul sometimes inclines towards the intellect and sometimes towards the qualities. The qualities do not know the soul, but the soul always knows the qualities, because it is the observer of the qualities and also the creator in the same way. Although both the intellect and the knower of the field are subtle things, but understand the difference between them as this: the intellect is the observed and the soul is the observer.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)