Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.248.15: परन्तु जब मनुष्य अपने मन की लगाम को रोककर इन्द्रिय-घोड़ों को वश में कर लेता है, तब वह ज्ञान के प्रकाश में आत्मा को देख सकता है, जैसे दीपक के प्रकाश में किसी वस्तु का आकार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.248.15 
तेषां तु मनसा रश्मीन् यदा सम्यङ्‍‍नियच्छति।
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा दीपदीप्ता यथाऽऽकृति:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
परन्तु जब मनुष्य अपने मन की लगाम को रोककर इन्द्रिय-घोड़ों को वश में कर लेता है, तब वह ज्ञान के प्रकाश में आत्मा को देख सकता है, जैसे दीपक के प्रकाश में किसी वस्तु का आकार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है ॥15॥
 
But when a man controls the sense-horses by keeping the reins of his mind at bay, he can see the Self in the light of knowledge, just as the shape of an object can be seen clearly in the light of a lamp. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)