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mahabharat 12.248.1: व्यासजी कहते हैं - बेटा! कर्म करने की प्रेरणा तीन प्रकार की होती है। पहले तो मन विचारों के द्वारा नाना प्रकार के भाव उत्पन्न करता है, बुद्धि उनका निर्णय करती है। तत्पश्चात् हृदय उनकी अनुकूलता और प्रतिकूलता का अनुभव करता है। (इसके पश्चात् कर्म में प्रवृत्ति होती है)॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 248: बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.248.1 
व्यास उवाच
मनो विसृजते भावं बुद्धिरध्यवसायिनी।
हृदयं प्रियाप्रिये वेद त्रिविधा कर्मचोदना॥ १॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं - बेटा! कर्म करने की प्रेरणा तीन प्रकार की होती है। पहले तो मन विचारों के द्वारा नाना प्रकार के भाव उत्पन्न करता है, बुद्धि उनका निर्णय करती है। तत्पश्चात् हृदय उनकी अनुकूलता और प्रतिकूलता का अनुभव करता है। (इसके पश्चात् कर्म में प्रवृत्ति होती है)॥1॥
 
Vyasji says – Son! There are three types of inspiration to do work. First of all, the mind creates different types of emotions through mere thoughts, the intellect decides them. After that the heart experiences their favorability and unfavourability. (After this there is a tendency in action)॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)