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शुक उवाच
अकरोद् यच्छरीरेषु कथं तदुपलक्षयेत्।
इन्द्रियाणि गुणा: केचित् कथं तानुपलक्षयेत्॥ ७॥
अनुवाद
शुकदेव ने पूछा, "पिताजी! देवताओं, मनुष्यों, पशु-पक्षियों के शरीरों में जो भेद विधाता ने किए हैं, उन्हें हम कैसे देख सकते हैं? शरीर में इन्द्रियाँ भी हैं और कुछ गुण भी हैं। हम उन्हें कैसे देख सकते हैं? हम कैसे पहचान सकते हैं कि इनमें से कौन-सा कार्य किस महाभूत का है?"
Shukdev asked, "Father! How can we see the differences that the Creator has made in the bodies of gods, humans, animals and birds? The body has senses and some qualities as well. How can we see them? How can we identify which of them is the work of which Mahabhoot?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥