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mahabharat 12.247.25: इसी प्रकार मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और अज्ञान का जो भी कारण हो, उन्हें तमोगुण का ही कार्य जानना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.247: महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 247: महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.247.25 
तथा मोह: प्रमादश्च निद्रा तन्द्रा प्रबोधिता।
कथंचिदभिवर्तन्ते विज्ञेयास्तामसा गुणा:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और अज्ञान का जो भी कारण हो, उन्हें तमोगुण का ही कार्य जानना चाहिए।
 
Similarly, whatever may be the cause of infatuation, negligence, sleep, drowsiness and ignorance, they should be known to be the work of the Tamoguna. 25.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)