श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  12.246.18-19 
श्लाघिने श्लाघनीयाय प्रशान्ताय तपस्विने॥ १८॥
इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च।
रहस्यधर्मं वक्तव्यं नान्यस्मै तु कथंचन॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो तत्वज्ञान की इच्छा रखता हो, प्रशंसनीय गुणों वाला हो, शान्त, तपस्वी और आज्ञाकारी शिष्य हो अथवा जिसका इन गुणों से युक्त प्रिय पुत्र हो, उसे ही इस गहन रहस्यमय धर्म का उपदेश देना चाहिए; अन्य किसी को किसी भी प्रकार नहीं ॥18-19॥
 
One who has a desire for philosophical knowledge, has admirable qualities, is peaceful, ascetic and a obedient disciple or has a beloved son with these qualities, he should be given the advice of this deep mysterious religion; Not to anyone else in any way. 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)