Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.246.17-18h: जो वेदों का विद्वान नहीं है, जो श्रद्धावान नहीं है, जो दोष-निंदा से रहित नहीं है, जो सरल स्वभाव का नहीं है और जो आज्ञाकारी नहीं है, जिसका हृदय तर्क की आलोचना से जल गया है और जो दूसरों की चुगली करता है, उसे यह ज्ञान देना उचित नहीं है।॥17 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  12.246.17-18h 
नावेदविदुषे वाच्यं तथा नानुगताय च।
नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे॥ १७॥
न तर्कशास्त्रदग्धाय तथैव पिशुनाय च।
 
 
अनुवाद
जो वेदों का विद्वान नहीं है, जो श्रद्धावान नहीं है, जो दोष-निंदा से रहित नहीं है, जो सरल स्वभाव का नहीं है और जो आज्ञाकारी नहीं है, जिसका हृदय तर्क की आलोचना से जल गया है और जो दूसरों की चुगली करता है, उसे यह ज्ञान देना उचित नहीं है।॥17 1/2॥
 
It is not appropriate to impart this knowledge to one who is not a scholar of the Vedas, who is not a devoted follower, who is not free from fault-finding, who is not of a simple nature and who is not obedient, whose heart has become burnt by criticizing logic and who gossips about others.॥ 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)