Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.246.11: जैसे मनुष्य निद्राकाल में सुखपूर्वक सोता है और गहरी निद्रा का आनंद अनुभव करता है, अथवा जैसे वायुरहित स्थान में जलने वाला दीपक कंपन नहीं करता और एक ही तार की भाँति जलता रहता है, वैसे ही मन भी कभी चंचल नहीं होना चाहिए। यह उनकी कृपा का, अर्थात् परम पवित्रता का लक्षण है। ॥11॥ | mahabharat अध्याय 12.246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा स्वप्ने सुखं स्वपेत्।
निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते॥ ११॥
अनुवाद
जैसे मनुष्य निद्राकाल में सुखपूर्वक सोता है और गहरी निद्रा का आनंद अनुभव करता है, अथवा जैसे वायुरहित स्थान में जलने वाला दीपक कंपन नहीं करता और एक ही तार की भाँति जलता रहता है, वैसे ही मन भी कभी चंचल नहीं होना चाहिए। यह उनकी कृपा का, अर्थात् परम पवित्रता का लक्षण है। ॥11॥
Just as a man sleeps comfortably during sleep and experiences the bliss of deep sleep, or just as a lamp burning in an airless place does not vibrate and burns like a single string, in the same way the mind should never be restless. This is the sign of His grace, that is, of supreme purity. ॥11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥