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mahabharat 12.246.10: मन की पूर्ण शुद्धता प्राप्त कर लेने वाला प्रयत्नशील योगी इस संसार में शुभ-अशुभ का त्याग कर देता है और सुखी एवं आत्मस्थ होकर शाश्वत सुख का उपभोग करता है। 10॥   |   mahabharat अध्याय 12.246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.246.10 
चित्तप्रसादेन यतिर्जहातीह शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमत्यन्तमश्नुते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मन की पूर्ण शुद्धता प्राप्त कर लेने वाला प्रयत्नशील योगी इस संसार में शुभ-अशुभ का त्याग कर देता है और सुखी एवं आत्मस्थ होकर शाश्वत सुख का उपभोग करता है। 10॥
 
The diligent Yogi, who has achieved complete purity of mind, gives up the good and bad in this world and enjoys eternal happiness by being happy and self-possessed. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)