Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.245.8: जिस प्रकार भयभीत हाथी भागकर किसी जलाशय में घुस जाता है, फिर अचानक बाहर आ जाता है और अपने पूर्व स्थान पर नहीं लौटता, उसी प्रकार जिस व्यक्ति में दूसरों के निन्दा या प्रशंसा के वचन प्रवेश तो कर जाते हैं, किन्तु वे उत्तर के रूप में वापस नहीं लौटते, अर्थात् जो किसी के निन्दा या प्रशंसा का उत्तर नहीं देता, वही त्याग आश्रम में रह सकता है। | mahabharat अध्याय 12.245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यस्मिन् वाच: प्राविशन्ति कूपे त्रस्ता द्विपा इव।
न वक्तारं पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत्॥ ८॥
अनुवाद
जिस प्रकार भयभीत हाथी भागकर किसी जलाशय में घुस जाता है, फिर अचानक बाहर आ जाता है और अपने पूर्व स्थान पर नहीं लौटता, उसी प्रकार जिस व्यक्ति में दूसरों के निन्दा या प्रशंसा के वचन प्रवेश तो कर जाते हैं, किन्तु वे उत्तर के रूप में वापस नहीं लौटते, अर्थात् जो किसी के निन्दा या प्रशंसा का उत्तर नहीं देता, वही त्याग आश्रम में रह सकता है।
Just as a frightened elephant runs away and enters a water body, and then suddenly comes out and does not return to its previous place, similarly, the person in whom the slanderous or praising words of others enter but they do not return back in the form of a reply, i.e., the one who does not reply to anyone's slander or praise, only he can live in the ashram of renunciation.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥