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mahabharat 12.245.5: जो आत्मज्ञान प्राप्त कर सर्वव्यापी होकर एकाकी विचरण करता है, न किसी को त्यागता है और न किसी के द्वारा त्यागा जाता है। संन्यासी को न तो कभी अग्नि जलानी चाहिए, न घर या मठ बनवाना चाहिए; उसे केवल भिक्षा मांगने के लिए ही गांव में जाना चाहिए। ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.245.5 
एकश्चरति य: पश्यन् न जहाति न हीयते।
अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जो आत्मज्ञान प्राप्त कर सर्वव्यापी होकर एकाकी विचरण करता है, न किसी को त्यागता है और न किसी के द्वारा त्यागा जाता है। संन्यासी को न तो कभी अग्नि जलानी चाहिए, न घर या मठ बनवाना चाहिए; उसे केवल भिक्षा मांगने के लिए ही गांव में जाना चाहिए। ॥5॥
 
He who after realizing the Self, wanders alone, being omnipresent, neither abandons anyone nor is abandoned by others. A Sanyasi should never set up a fire, nor should he build a house or a monastery; he should go to the village only to beg for alms. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)