Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.245.35: जो ब्राह्मण न तो स्वयं निन्दनीय है और न ही दूसरों की निन्दा करता है, वही ब्रह्म का दर्शन कर सकता है। जिसके आसक्ति और पाप नष्ट हो गए हैं, वह इस लोक और परलोक के भोगों में आसक्त नहीं होता ॥35॥ | mahabharat अध्याय 12.245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अगर्हणीयो न च गर्हतेऽन्यान्
स वै विप्र: परमात्मानमीक्षेत्।
विनीतमोहो व्यपनीतकल्मषो
न चेह नामुत्र च सोऽन्नमृच्छति॥ ३५॥
अनुवाद
जो ब्राह्मण न तो स्वयं निन्दनीय है और न ही दूसरों की निन्दा करता है, वही ब्रह्म का दर्शन कर सकता है। जिसके आसक्ति और पाप नष्ट हो गए हैं, वह इस लोक और परलोक के भोगों में आसक्त नहीं होता ॥35॥
Only that Brahmin who is neither condemnable himself nor criticises others can see the Supreme Being. He whose attachments and sins have been removed is not attached to the pleasures of this world or the next. ॥ 35॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥