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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.245.32 
आवर्तमानमजरं विवर्तनं
षण्णाभिकं द्वादशारं सुपर्व।
यस्येदमास्ये परियाति विश्वं
तत् कालचक्रं निहितं गुहायाम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जो निरन्तर घूमता रहता है, कभी जीर्ण-शीर्ण या दुर्बल नहीं होता, जो लोगों की आयु घटाता है, जिसकी नाभि छह ऋतुएँ हैं, जिसका पतवार बारह महीने हैं, जिसका आकर्षण दर्श-पूर्णमास तथा अन्य सुन्दर त्यौहार हैं; जिसके मुख में यह सम्पूर्ण जगत् अन्न के समान प्रवेश करता है, वह कालचक्र बुद्धिरूपी गुफा में स्थित है (जो उसे जानता है, उसके शुभ कर्मों की देवता प्रशंसा करते हैं)।॥ 32॥
 
The one who keeps rotating continuously, never becomes worn out or weak, who reduces the life span of people, whose navel is the six seasons, whose helm is the twelve months, whose charms are the Darsha-Purna-maasa and other beautiful festivals; in whose mouth this entire universe enters like food, that time-cycle is situated in the cave of the intellect (the gods praise the good deeds of one who knows it).॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)