Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.245.27: जो संन्यासी मुख खोलकर 'प्राणाय स्वाहा' आदि मंत्रों से जीवों को भोजन नहीं देता, अपितु प्राणों (इन्द्रियों, मन आदि) को आत्मा में ही आहुति देता है, उसका सिर और शरीर के सभी अंग तथा किए-अकरए कर्मों का समूह अग्नि का भाग हो जाता है, अर्थात् वह उस अग्नि का स्वरूप हो जाता है, जो सृष्टि के आरम्भ से जीवों की नाभि में जठराग्नि के रूप में विद्यमान है और सम्पूर्ण जगत का आश्रय है। वह वैश्वानर (अग्नि) इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। 27॥ | mahabharat अध्याय 12.245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उत्तान आस्ये न हविर्जुहोति
लोकस्य नाभिर्जगत: प्रतिष्ठा।
तस्याङ्गमङ्गानि कृताकृतं च
वैश्वानर: सर्वमिदं प्रपेदे॥ २७॥
अनुवाद
जो संन्यासी मुख खोलकर 'प्राणाय स्वाहा' आदि मंत्रों से जीवों को भोजन नहीं देता, अपितु प्राणों (इन्द्रियों, मन आदि) को आत्मा में ही आहुति देता है, उसका सिर और शरीर के सभी अंग तथा किए-अकरए कर्मों का समूह अग्नि का भाग हो जाता है, अर्थात् वह उस अग्नि का स्वरूप हो जाता है, जो सृष्टि के आरम्भ से जीवों की नाभि में जठराग्नि के रूप में विद्यमान है और सम्पूर्ण जगत का आश्रय है। वह वैश्वानर (अग्नि) इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। 27॥
The sannyasi who does not offer food to the souls with the mantras like 'Pranaya Swaha' etc. with his mouth open, but instead sacrifices the life (sensory organs, mind etc.) in the soul, his head and all his body parts and the group of actions done and not done become the part of Agni, i.e. he becomes the form of that fire, which is present in the form of gastrointestinal tract in the navel of the living beings since the beginning of the creation. and is the shelter of the entire world. That Vaishvanar (fire) has pervaded this entire world. 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥