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mahabharat 12.245.25: सब प्राणी सुख से प्रसन्न होते हैं और दुःख से बहुत डरते हैं; इसलिए जो भक्त प्राणियों पर भय आते देखकर दुःखी होता है, उसे भययुक्त कर्म नहीं करने चाहिए ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 12.245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 245: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.245.25 
सर्वाणि भूतानि सुखे रमन्ते
सर्वाणि दु:खस्य भृशं त्रसन्ते।
तेषां भयोत्पादनजातखेद:
कुर्यान्न कर्माणि हि श्रद्दधान:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
सब प्राणी सुख से प्रसन्न होते हैं और दुःख से बहुत डरते हैं; इसलिए जो भक्त प्राणियों पर भय आते देखकर दुःखी होता है, उसे भययुक्त कर्म नहीं करने चाहिए ॥25॥
 
All beings are pleased with happiness and are very afraid of unhappiness; therefore, a devotee who feels sad on seeing fear coming upon beings should not perform fearful acts. ॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)