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mahabharat 12.244.7: वनवासी मुनि को बिना जोती हुई भूमि से उत्पन्न धान, जौ, नेवार और विघास (अतिथियों को देने से बचा हुआ) अन्न खाकर निर्वाह करना चाहिए। वानप्रस्थ में भी पंच महायज्ञों में हविष्य वितरित करना चाहिए। 7॥   |   mahabharat अध्याय 12.244: वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 244: वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.244.7 
अफालकृष्टं व्रीहियवं नीवारं विघसानि च।
हवींषि सम्प्रयच्छेत मखेष्वत्रापि पञ्चसु॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वनवासी मुनि को बिना जोती हुई भूमि से उत्पन्न धान, जौ, नेवार और विघास (अतिथियों को देने से बचा हुआ) अन्न खाकर निर्वाह करना चाहिए। वानप्रस्थ में भी पंच महायज्ञों में हविष्य वितरित करना चाहिए। 7॥
 
A forest-dwelling sage should survive on paddy, barley, newar and vighas (left over from giving to guests) food produced from unplowed earth. Even in Vanaprastha, distribute Havishya in Panch Mahayagyas. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)