श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 244: वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.244.27 
केशलोमनखान् वाप्य वानप्रस्थो मुनिस्तत:।
आश्रमादाश्रमं पुण्यं पूतो गच्छति कर्मभि:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वानप्रस्थ मुनि अपने केश, केश और नख काटकर अपने कर्मों से शुद्ध होकर वानप्रस्थ आश्रम से पुण्यमय संन्यास आश्रम में प्रवेश करते हैं ॥27॥
 
Thereafter, Vanaprastha Muni, after cutting his hair, hair and nails, gets purified by his actions and enters the virtuous Sannyasa Ashram from Vanaprastha Ashram. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)