श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 244: वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  12.244.24-25 
आत्मयाजी सोऽऽत्मरतिरात्मक्रीडात्मसंश्रय:।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहान्॥ २४॥
साद्यस्कांश्च यजेद् यज्ञानिष्टीश्चैवेह सर्वदा।
यदैव याजिनां यज्ञादात्मनीज्या प्रवर्तते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
फिर आत्मा में ही लीन होकर और आत्मा में ही क्रीड़ा करते हुए आत्मा का ही यज्ञ करना चाहिए। सब प्रकार से आत्मा का ही आश्रय लेना चाहिए। आत्मा में ही अग्निहोत्र की अग्नियों को स्थापित करके, संग्रह की समस्त आसक्ति त्याग देनी चाहिए और ब्रह्मयज्ञ आदि यज्ञों और इष्टि का, जो तत्काल करने योग्य हैं, सदैव मानसिक अनुष्ठान करते रहना चाहिए। ऐसा तब तक करते रहना चाहिए जब तक याज्ञिक अपने कर्मयज्ञ से विमुख होकर आत्मयज्ञ का अभ्यास न करने लगें। 24-25॥
 
Then the yajna of the soul itself should be done by being absorbed in the soul and playing in the soul only. Take shelter of the soul in every way. By implanting the fires of Agnihotra in the soul itself, one should give up all attachment to collection and always keep performing mental rituals for the Brahma Yagya etc. Yagyas and Ishti which are to be performed immediately. Do this until the yagyniks move away from their karmic yagya and practice self-sacrifice. 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)