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mahabharat 12.244.1-d1h: भीष्मजी कहते हैं - पुत्र युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें बुद्धिमान पुरुषों द्वारा निर्धारित और आचरण किया जाने वाला गृहस्थ धर्म बताया है। तत्पश्चात् व्यासजी ने अपने महापुरुष शुकदेवजी से जो कुछ कहा था, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.244: वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 244: वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 1-d1h
 
 
श्लोक  12.244.1-d1h 
भीष्म उवाच
प्रोक्ता गृहस्थवृत्तिस्ते विहिता या मनीषिभि:।
तदनन्तरमुक्तं यत् तन्निबोध युधिष्ठिर॥ १॥
(व्यासेन कथितं पूर्वं सुताय सुमहात्मने।)
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - पुत्र युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें बुद्धिमान पुरुषों द्वारा निर्धारित और आचरण किया जाने वाला गृहस्थ धर्म बताया है। तत्पश्चात् व्यासजी ने अपने महापुरुष शुकदेवजी से जो कुछ कहा था, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो॥1॥
 
Bhishmaji says-Son Yudhishthir! I have described to you the household profession which has been prescribed and practised by wise men. Thereafter, I will tell you whatever Vyasaji had said to his great son Shukdev, listen.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)