श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.242.9 
नि:स्तुतिर्निर्नमस्कार: परित्यज्य शुभाशुभे।
अरण्ये विचरैकाकी येन केनचिदाशित:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव! तुम भी स्तुति और नमस्कार से विरत होकर, शुभ-अशुभ सभी कर्मों को त्यागकर, जो भी फल-मूल मिल जाए, उसी से अपनी भूख मिटाते हुए, वन में अकेले विचरण करो॥9॥
 
Shukdev! You too should roam alone in the forest, abstaining from praise and salutations, abandoning all good and bad deeds, satiating your hunger with whatever fruits and roots you can find.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)