श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.242.4 
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञ: पूतोऽहं गुरुशासनात्।
कृत्वा बुद्धिं विमुक्तात्मा द्रक्ष्याम्यात्मानमव्ययम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
आप जैसे गुरु के उपदेश से मैं पवित्र हो गया हूँ और सांसारिक रीति-रिवाजों का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया है; अतः धर्माचरण से बुद्धि को शुद्ध करके मैं अपने देह के अभिमान को त्याग दूँगा और अपने अविनाशी ईश्वरस्वरूप का दर्शन करूँगा॥4॥
 
I have become pure by the teachings of a Guru like you and I have also gained knowledge of the worldly customs and traditions; therefore, after purifying my intellect with righteous conduct, I shall give up the pride of my physical body and see my imperishable form as God.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)