श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.242.30 
धर्मलब्धैर्युतो दारैरग्नीनुत्पाद्य यत्नत:।
द्वितीयमायुषो भागं गृहमेधी भवेद् व्रती॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
धर्मपूर्वक पत्नी का हाथ पकड़कर बड़ी सावधानी से उसके साथ अग्नि स्थापित करे और जीवन के उत्तरार्ध तक अर्थात् पचास वर्ष की आयु तक उत्तम व्रतों का पालन करते हुए गृहस्थ रहे ॥30॥
 
After taking the hand of a wife in a religious manner, one should with great care establish a fire with her and remain a householder by observing excellent vows till the second half of one's life, i.e. till the age of fifty years. ॥ 30॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)