श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.242.21 
नाभुक्तवति चाश्नीयादपीतवति नो पिबेत्।
नातिष्ठति तथाऽऽसीत नासुप्ते प्रस्वपेत च॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जब तक आचार्य भोजन न कर लें, तब तक भोजन नहीं करना चाहिए। जब ​​तक वे भोजन न कर लें, तब तक कुछ भी पीना या पीना नहीं चाहिए। जब ​​तक वे बैठ न जाएँ, तब तक बैठना नहीं चाहिए और जब तक वे सो न जाएँ, तब तक सोना नहीं चाहिए ॥21॥
 
One should not eat until the Acharya has eaten. One should not drink or drink until he has had his meals. One should not sit before he sits and should not sleep before he sleeps. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)