श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.242.2 
भूय एव तु लोकेऽस्मिन् सद्‍वृत्तिं कालहैतुकीम्।
यया सन्त: प्रवर्तन्ते तदिच्छाम्यनुवर्तितुम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
अब मैं पुनः प्रत्येक युग में शिष्ट पुरुषों द्वारा अपनाई गई आचार-संहिता और सज्जन पुरुषों द्वारा अपनाए गए आचरण का अनुसरण करना चाहता हूँ॥ 2॥
 
Now once again I wish to follow the code of conduct followed by the courteous men in each age and the behaviour followed by the virtuous men.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)