vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन
»
श्लोक 2
श्लोक
12.242.2
भूय एव तु लोकेऽस्मिन् सद्वृत्तिं कालहैतुकीम्।
यया सन्त: प्रवर्तन्ते तदिच्छाम्यनुवर्तितुम्॥ २॥
अनुवाद
अब मैं पुनः प्रत्येक युग में शिष्ट पुरुषों द्वारा अपनाई गई आचार-संहिता और सज्जन पुरुषों द्वारा अपनाए गए आचरण का अनुसरण करना चाहता हूँ॥ 2॥
Now once again I wish to follow the code of conduct followed by the courteous men in each age and the behaviour followed by the virtuous men.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×