श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.242.17 
जघन्यशायी पूर्वं स्यादुत्थाय गुरुवेश्मनि।
यच्च शिष्येण कर्तव्यं कार्यं दासेन वा पुन:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
गुरु के सो जाने के बाद उसे भूमि पर सोना चाहिए और उनके उठने से पहले उठ जाना चाहिए। गुरु के घर में शिष्य या सेवक को जो भी काम करना हो, वह स्वयं ही करना चाहिए।॥17॥
 
He should sleep on the floor after the Guru has gone to sleep and get up before he wakes up. Whatever work is to be done by a disciple or a servant in the Guru's house, he should do it himself.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)