श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.242.16 
आयुषस्तु चतुर्भागं ब्रह्मचार्यनसूयक:।
गुरौ वा गुरुपुत्रे वा वसेद् धर्मार्थकोविद:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
द्विज बालक को चाहिए कि वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपनी आयु के एक चौथाई भाग अर्थात् पच्चीस वर्ष तक अपने गुरु या गुरुपुत्र की सेवा में रहे। वहाँ रहते हुए किसी के दोषों को न देखे। ऐसा करने वाला ब्रह्मचारी धर्म और अर्थशास्त्र के ज्ञान में कुशल होता है। 16॥
 
A Dwija child should follow celibacy and remain in the service of his Guru or Guru's son for one-fourth of his age i.e. twenty-five years. Don't look at anyone's faults while staying there. A celibate who does this is skilled in the knowledge of religion and economics. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)