श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 242: आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.242.13 
व्यास उवाच
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुक:।
यथोक्तचारिण: सर्वे गच्छन्ति परमां गतिम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले - बेटा ! ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी - ये सभी अपने-अपने आश्रमों के लिए शास्त्रविहित रीति से आचरण करके परम गति को प्राप्त होते हैं ॥13॥
 
Vyasji said – Son! Brahmachari, householder, Vanaprastha and Sanyasi - all of them attain the supreme state by following the scriptures prescribed for their respective ashrams. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)