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mahabharat 12.241.7: मनुष्य स्वार्थपूर्वक कर्मों से बंधता है और ज्ञान से मुक्त होता है, इसलिए दूरदर्शी तपस्वी कर्म नहीं करता ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.241.7 
कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते।
तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतय: पारदर्शिन:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य स्वार्थपूर्वक कर्मों से बंधता है और ज्ञान से मुक्त होता है, इसलिए दूरदर्शी तपस्वी कर्म नहीं करता ॥7॥
 
'A man is bound by selfish actions and is liberated by knowledge. Therefore, a far-sighted ascetic does not perform actions. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)