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mahabharat 12.241.13: जहाँ उस परम ब्रह्म का, उस परम पुरुष का, साक्षात्कार हो सके, जो बिना किसी दुःख के प्राप्त किया जा सकता है, जो एक होने पर कभी पृथक नहीं हो सकता, जो अव्यक्त, अचल, नित्य, अनिर्वचनीय और निर्विकार है॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.241.13 
यत्र तद् ब्रह्म परममव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
अव्याकृतमनायासमव्यक्तं चावियोगि च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जहाँ उस परम ब्रह्म का, उस परम पुरुष का, साक्षात्कार हो सके, जो बिना किसी दुःख के प्राप्त किया जा सकता है, जो एक होने पर कभी पृथक नहीं हो सकता, जो अव्यक्त, अचल, नित्य, अनिर्वचनीय और निर्विकार है॥13॥
 
'Where one can have a vision of that Supreme Brahma, the Supreme Being, who can be attained without any suffering, who when united can never be separated, who is unmanifest, immovable, eternal, indescribable and without any changes.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)