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mahabharat 12.241.1: शुकदेवजी ने पूछा - "पिताजी! मैं वेदों में कहे गए 'कर्तव्य करो' और 'कर्तव्य का परित्याग करो' इन दो शब्दों के विषय में जानना चाहता हूँ। ज्ञान के द्वारा कर्तव्य का परित्याग करने पर मनुष्य किस दिशा में जाते हैं? और कर्तव्य का पालन करते हुए वे किस गति को प्राप्त होते हैं?॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.241.1 
शुक उवाच
यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।
कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा॥ १॥
 
 
अनुवाद
शुकदेवजी ने पूछा - "पिताजी! मैं वेदों में कहे गए 'कर्तव्य करो' और 'कर्तव्य का परित्याग करो' इन दो शब्दों के विषय में जानना चाहता हूँ। ज्ञान के द्वारा कर्तव्य का परित्याग करने पर मनुष्य किस दिशा में जाते हैं? और कर्तव्य का पालन करते हुए वे किस गति को प्राप्त होते हैं?॥1॥
 
Shukdev asked, "Father! I want to know about the two words in the Vedas, 'do your duty' and 'abandon your duty'. In which direction do men go after abandoning duty through knowledge? And what state do they attain by performing duty?॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)