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mahabharat 12.240.15: जैसे जलपात्र में छिद्र हो तो जल वहीं से निकल जाता है, वैसे ही यदि पाँच इन्द्रियों वाले जीव की एक भी इन्द्रिय में छिद्र हो और वह सांसारिक भोगों की ओर प्रवृत्त हो जाए, तो उसके कारण उसकी बुद्धि क्षीण हो जाती है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.240: योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 240: योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.240.15 
जन्तो: पञ्चेन्द्रियस्यास्य यदेकं छिद्रमिन्द्रियम्।
ततोऽस्य स्रवते प्रज्ञा दृते: पादादिवोदकम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे जलपात्र में छिद्र हो तो जल वहीं से निकल जाता है, वैसे ही यदि पाँच इन्द्रियों वाले जीव की एक भी इन्द्रिय में छिद्र हो और वह सांसारिक भोगों की ओर प्रवृत्त हो जाए, तो उसके कारण उसकी बुद्धि क्षीण हो जाती है ॥15॥
 
Just as if there is a hole in a water-skin, the water flows out from there, similarly if even one of the senses of a living being having five senses has a hole in it and gets inclined towards the worldly pleasures, then its intellect gets weakened due to that. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)