श्लोक 1: व्यास कहते हैं - 'हे शुकपुत्र! तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मैंने जो कुछ भी ज्ञान के विषय में यथार्थ रूप में यहाँ वर्णन किया है, वह सब बातें सांख्य ज्ञान से ही संबंधित हैं।॥1॥
श्लोक 2-3h: अब मैं योग-संबंधी समस्त क्रियाओं का वर्णन आरंभ करता हूँ, सुनो। तात! योगशास्त्र के अनुसार, इन्द्रियों, मन और बुद्धि को सब ओर से रोककर सर्वव्यापी आत्मा के साथ उनकी एकता स्थापित करना ही सर्वोत्तम ज्ञान है। 2 1/2॥
श्लोक 3-4h: इसकी प्राप्ति के लिए साधक को चाहिए कि वह अपना मन अन्य सब वस्तुओं से हटा ले, शम, दम आदि साधनों से युक्त हो, अपनी आत्मा का चिंतन करे, केवल भगवान् में रमण करे, ज्ञानी पुरुष से ज्ञान प्राप्त करे तथा शास्त्रविहित पवित्र कर्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से पालन करते हुए ज्ञात तत्त्व को जाने। 3 1/2॥
श्लोक 4-6h: योग में विद्वानों द्वारा बताए गए पाँच विकारों - काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवाँ स्वप्न - का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। इनमें से क्रोध को मन को वश में करके (मन को संयमित करके) जीता जा सकता है, काम-संकल्प को त्यागकर उसे परास्त किया जा सकता है और धैर्यवान व्यक्ति सत्त्वगुण का सेवन करके निद्रा पर विजय प्राप्त कर सकता है। 4-5 1/2॥
श्लोक 6-7: मनुष्य को धैर्य के द्वारा अपने लिंग और उदर की रक्षा करनी चाहिए, अर्थात् विषय-भोग और भोजन की चिंता को दूर करना चाहिए। नेत्रों के द्वारा हाथ-पैरों की रक्षा करनी चाहिए, मन के द्वारा नेत्रों और कानों की रक्षा करनी चाहिए, तथा कर्मों के द्वारा मन और वाणी की रक्षा करनी चाहिए, अर्थात् उन्हें शुद्ध करना चाहिए। सावधानी के द्वारा भय का त्याग करना चाहिए और विद्वानों की संगति से अहंकार का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 8: इस प्रकार आलस्य का त्याग करके सदैव सावधानी से इन योग-संबंधी दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए तथा अग्नि और ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए तथा देवताओं को नमस्कार करना चाहिए ॥8॥
श्लोक 9-10h: साधक को मन को ठेस पहुँचाने वाले अथवा हिंसात्मक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। शुद्ध एवं तेजस्वी ब्रह्म ही सबका बीज (कारण) है। जो कुछ भी दिखाई देता है, वह उसका सार (कार्य) है। समस्त जड़-चेतन जगत उसी ब्रह्म के दर्शन (संकल्प) का परिणाम है। 9 1/2।
श्लोक 10-11: ध्यान, वेदाध्ययन, दान, सत्य, शील, सरलता, क्षमा, शौच, आचरण की पवित्रता और इन्द्रिय संयम - इनसे तेज बढ़ता है और पाप नष्ट होते हैं ॥10-11॥
श्लोक 12-13: इतना ही नहीं, इनसे साधक की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं और उसे ज्ञान की प्राप्ति भी होती है। योगी को सभी प्राणियों के प्रति समान भाव रखना चाहिए। जो मिले या न मिले, उसमें संतोषपूर्वक रहना चाहिए। पापों को धोकर तेजस्वी बनना चाहिए, संयम से भोजन करना चाहिए, इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए तथा काम-क्रोध को वश में करके ब्रह्मपद की प्राप्ति की इच्छा करनी चाहिए॥12-13॥
श्लोक 14: योगी को अपने मन और इन्द्रियों को एकाग्र करके रात्रि के प्रथम और अंतिम प्रहर में ध्यान करना चाहिए तथा अपने मन को आत्मा पर केन्द्रित करना चाहिए।
श्लोक 15: जैसे जलपात्र में छिद्र हो तो जल वहीं से निकल जाता है, वैसे ही यदि पाँच इन्द्रियों वाले जीव की एक भी इन्द्रिय में छिद्र हो और वह सांसारिक भोगों की ओर प्रवृत्त हो जाए, तो उसके कारण उसकी बुद्धि क्षीण हो जाती है ॥15॥
श्लोक 16: जिस प्रकार एक मछुआरा अपने जाल में फंसी दुष्ट मछली को पहले पकड़ता है, उसी प्रकार योगाभ्यासी को भी पहले अपने मन को वश में करना चाहिए। उसके बाद उसे अपने कानों, फिर अपनी आँखों, फिर अपनी जीभ और नाक आदि को वश में करना चाहिए।
श्लोक 17: प्रयत्नशील साधक को चाहिए कि वह इन पाँचों इन्द्रियों को वश में करके उन्हें अपने मन में स्थापित करे। इसी प्रकार संकल्पों को त्यागकर मन को बुद्धि में एकाग्र करे। 17॥
श्लोक 18-19h: योगी को चाहिए कि वह पाँचों इन्द्रियों को वश में करके उन्हें अपने मन में दृढ़तापूर्वक स्थापित करे। जब छठा मन सहित ये इन्द्रियाँ बुद्धि में स्थिर होकर प्रसन्न (स्वच्छ) हो जाती हैं, तब वह योगी ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। 18 1/2॥
श्लोक 19-20h: वह योगी अपने हृदय में आत्मा को धूमरहित अग्नि के समान जलते हुए प्रकाश के समान, तेजस्वी सूर्य को तथा आकाश में चमकती हुई बिजली के समान देखता है । 19 1/2॥
श्लोक 20-21: उस आत्मा में सब कुछ दिखाई देता है और सर्वव्यापक होने के कारण वह आत्मा सबमें दिखाई देता है। जो महात्मा ब्राह्मण बुद्धिमान, परमज्ञानी, धैर्यवान और समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, वे ही उस परमात्मा को देख पाते हैं। 20-21॥
श्लोक 22: जो योगी प्रतिदिन एकान्त स्थान में एक निश्चित समय तक बैठकर इस प्रकार नियमों का भलीभाँति पालन करते हुए योगाभ्यास करता है, वह अक्षर-ब्रह्म की समता को प्राप्त होता है ॥22॥
श्लोक 23: योगाभ्यास में आगे बढ़ने पर, मोह, भ्रांति और पुनरावृत्ति जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। फिर दिव्य सुगंध प्राप्त होती है, दिव्य शब्द सुनाई देते हैं और दिव्य रूपों के दर्शन होते हैं। विविध प्रकार के अद्भुत स्वाद और स्पर्शों का अनुभव होता है। इच्छानुसार शीत और उष्णता प्राप्त होती है तथा वायु रूप में आकाश में विचरण करने की शक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 24: प्रतिभा बढ़ती है। दिव्य सुख स्वतः ही प्रकट होते हैं। योगबल से इन सभी सिद्धियों को प्राप्त करने के बाद भी, तत्त्व को जानने वाले योगी को इनका आदर नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये सभी योग में बाधक हैं। अतः उसे इनसे मन हटाकर आत्मा में ध्यान लगाना चाहिए। 24
श्लोक 25: दैनिक दिनचर्या का पालन करते हुए, योगी को दिन में तीन बार (सुबह और रात के पहले और आखिरी घंटों में) किसी पहाड़ की चोटी पर स्थित किसी देवता के वृक्ष के पास या किसी एकांत मंदिर में या किसी वृक्ष के सामने बैठकर योग का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 26: जैसे धन चाहने वाला मनुष्य सदैव भौतिक वस्तुओं को अपनी कोठरी में बाँधकर रखता है, उसी प्रकार योगाभ्यासी को भी चाहिए कि वह इन्द्रियों को वश में रखे और प्रतिदिन हृदय कमल में स्थित आत्मा का ध्यान करे। योग द्वारा अपने मन को विचलित न होने दे। 26॥
श्लोक 27: योगाभ्यासी को चाहिए कि वह उन साधनों को अपनाए जिनसे चंचल मन को वश में किया जा सके और उस साधन से कभी विचलित न हो। 27.
श्लोक 28: एकाग्र योगी को पर्वत की निर्जन गुफा, भगवान का मंदिर तथा मौन का एकांत घर अपने निवास के रूप में चुनना चाहिए।
श्लोक 29: योगाभ्यासी को मन, वाणी और कर्म से किसी में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। उसे सबके प्रति उदासीनता का भाव रखना चाहिए। उसे नियमपूर्वक भोजन करना चाहिए और लाभ-हानि में समभाव रखना चाहिए।॥29॥
श्लोक 30: उसे अपनी स्तुति करनेवालों और निन्दा करनेवालों दोनों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए तथा किसी के प्रति अच्छा या किसी के प्रति बुरा विचार नहीं करना चाहिए ॥30॥
श्लोक 31: यदि तुम्हें कुछ प्राप्त हो जाए तो अति प्रसन्न मत हो और यदि कुछ न मिले तो भी चिन्ता मत करो। सब प्राणियों के प्रति समभाव रखो। यद्यपि तुम वायु के समान सर्वत्र विचरण करते हो, फिर भी तुम्हें अनासक्त और निर्लिप्त रहना चाहिए ॥31॥
श्लोक 32: इस प्रकार जो महायोगी स्वस्थ मन वाला, सर्वत्र समभाव रखने वाला, तथा जो छः महीने तक प्रतिदिन योगाभ्यास करता हुआ कर्मफल का उल्लंघन करता है, वह वेदों में वर्णित परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करता है॥32॥
श्लोक 33: धन के लिए दुःख भोगते हुए लोगों को देखकर धन से विरक्त हो जाना चाहिए और मिट्टी, पत्थर और सोने के ढेले को एक समान समझना चाहिए। विरक्त पुरुष को न तो इस योगमार्ग से विमुख होना चाहिए और न आसक्ति में पड़ना चाहिए ॥33॥
श्लोक 34: चाहे कोई पुरुष या स्त्री नीच जाति का हो, यदि उनमें धर्मप्राप्ति की इच्छा हो, तो वे भी इस योगमार्ग का अनुसरण करके परम मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं ॥ 34॥
श्लोक 35: मन को वश में कर लेने वाला योगी ही अजन्मा, पुरातन, अमर, नित्य, नित्य मुक्त, अणु से भी सूक्ष्म और महत्तम से भी महान्, उस परमात्मा की आत्मा का अनुभव करता है, जो शान्त मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होती है ॥35॥
श्लोक 36: जो लोग महर्षि महात्मा व्यास द्वारा दिए गए इस उपदेश पर यथार्थ रूप से मन में विचार करते हैं और उसे अच्छी तरह समझकर उसके अनुसार आचरण करते हैं, वे ज्ञानी पुरुष ब्रह्माजी की समता को प्राप्त होते हैं और प्रलयकाल तक ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी के साथ रहकर अंत में उन्हीं के साथ मुक्त हो जाते हैं ॥36॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥