Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.24.27-28: उनका धनुष ही यूप था, करधनी ही प्रत्यंचा के समान थी, बाण ही स्रुक का कार्य कर रहा था और तलवार ही स्रुवा का कार्य कर रही थी, रक्त ही घी के समान था, इच्छानुसार चलने वाला रथ ही वेदी था, युद्ध ही अग्नि था और चार मुख्य घोड़े ब्रह्मा तथा चार ऋत्विज थे। इस प्रकार बलवान राजासिंह हयग्रीव यज्ञ में अपने शत्रुओं की आहुति देकर पापों से मुक्त हो गए और प्राण त्यागकर तथा युद्ध के अंत की राख में स्नान करके अब देवताओं के लोक में आनन्द ले रहे हैं। | mahabharat अध्याय 12.24: व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उनका धनुष ही यूप था, करधनी ही प्रत्यंचा के समान थी, बाण ही स्रुक का कार्य कर रहा था और तलवार ही स्रुवा का कार्य कर रही थी, रक्त ही घी के समान था, इच्छानुसार चलने वाला रथ ही वेदी था, युद्ध ही अग्नि था और चार मुख्य घोड़े ब्रह्मा तथा चार ऋत्विज थे। इस प्रकार बलवान राजासिंह हयग्रीव यज्ञ में अपने शत्रुओं की आहुति देकर पापों से मुक्त हो गए और प्राण त्यागकर तथा युद्ध के अंत की राख में स्नान करके अब देवताओं के लोक में आनन्द ले रहे हैं।
'His bow itself was Yupa, the girdle was like a string, the arrow was giving the function of sruka and the sword was giving the function of sruva, the blood itself was like ghee, the chariot that could move as per wish was the altar, the war was fire and the four main horses were Brahma and the four Ritvijas. In this way, the mighty King Singh Hayagriva became free from his sins by sacrificing his enemies in the sacrificial fire and after sacrificing his life and taking a bath in the ashes of the end of the war, he is now enjoying in the world of gods. 27-28॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥