श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 239: ज्ञानका साधन और उसकी महिमा  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  12.239.26-27h 
न तदूर्ध्वं न तिर्यक् च नाधो न च पुन: पुन:।
न मध्ये प्रतिगृह्णीते नैव किंचित् कुतश्चन॥ २६॥
सर्वेऽन्त:स्था इमे लोका बाह्यमेषां न किंचन।
 
 
अनुवाद
वह ईश्वर न ऊपर है, न नीचे, न बगल में है, न बीच में। कोई भी स्थान उसे समा नहीं सकता, वह ईश्वर एक स्थान से दूसरे स्थान को नहीं जाता। ये सब लोक उसी में स्थित हैं, इनका कोई भी भाग या क्षेत्र उस ईश्वर से बाहर नहीं है। ॥26 1/2॥
 
That God is neither above nor below, nor is He present beside or in the middle. No particular place can contain Him, that God does not go from one place to another. All these worlds are situated within Him, no part or region of these is outside that God. ॥26 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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