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mahabharat 12.239.23: जो सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा होकर सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण में लगा रहता है, जिसका अपना कोई स्पष्ट मार्ग नहीं है और जो ब्रह्मपद को प्राप्त करना चाहता है; उस समर्थ ज्ञानयोगी का मार्ग ढूँढ़ने में देवता भी मोहित हो जाते हैं ॥23॥   |   mahabharat अध्याय 12.239: ज्ञानका साधन और उसकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 239: ज्ञानका साधन और उसकी महिमा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.239.23 
सर्वभूतात्मभूतस्य विभोर्भूतहितस्य च।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिण:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा होकर सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण में लगा रहता है, जिसका अपना कोई स्पष्ट मार्ग नहीं है और जो ब्रह्मपद को प्राप्त करना चाहता है; उस समर्थ ज्ञानयोगी का मार्ग ढूँढ़ने में देवता भी मोहित हो जाते हैं ॥23॥
 
He who, being the soul of all beings, is engaged in the welfare of all beings, who has no clear path of his own and who wishes to achieve the state of Brahman; even the gods get fascinated in searching for the path of that capable Gyan Yogi. ॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)