श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.238.9 
तपोधर्मेण संयुक्तस्तपोनित्य: सुसंशित:।
तेन सर्वानवाप्नोति कामान् यान् मनसेच्छति॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य तप धर्म से युक्त होकर, आत्मसंयम का पूर्ण पालन करते हुए सदैव तप में तत्पर रहता है, वह इसके द्वारा अपने मन में जो भी कामनाएँ रखता है, उन सब को प्राप्त कर लेता है ॥9॥
 
A man who is united with the religion of austerity and is always devoted to austerity while fully observing self-restraint, achieves all the desires that he wishes for in his mind through it. ॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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