श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.238.1 
व्यास उवाच
एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते।
ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति॥ १॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं- बेटा! यह ब्राह्मणों की अत्यन्त प्राचीन रीति है, जिसका शास्त्रों में विधान है। ज्ञानी पुरुष ही सर्वत्र कर्म करके सफलता प्राप्त करता है। 1॥
 
Vyasji says-Son! This is a very ancient practice of Brahmins, which is prescribed in the scriptures. Only a knowledgeable person achieves success by doing work everywhere. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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