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mahabharat 12.237.6: जो नास्तिक प्रकृतिवाद का आश्रय लेकर ईश्वर और परोक्ष के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, यह उनका मोहजनित कृत्य है। प्रकृतिवाद केवल मूर्खों की कल्पना मात्र है। यह मनुष्यों को परम लक्ष्य से वंचित करके उनका विनाश करने के लिए ही प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति के तत्त्वों और प्रभाव की जो चर्चा नीचे दी जाएगी, उसे सुनो। ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.237: सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 237: सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.237.6 
स्वभावो हि विनाशाय मोहकर्म मनोभव:।
निरुक्तमेतयोरेतत् स्वभावपरिभावयो:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो नास्तिक प्रकृतिवाद का आश्रय लेकर ईश्वर और परोक्ष के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, यह उनका मोहजनित कृत्य है। प्रकृतिवाद केवल मूर्खों की कल्पना मात्र है। यह मनुष्यों को परम लक्ष्य से वंचित करके उनका विनाश करने के लिए ही प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति के तत्त्वों और प्रभाव की जो चर्चा नीचे दी जाएगी, उसे सुनो। ॥6॥
 
Atheists who do not accept the existence of God and the unseen by taking refuge in naturalism, this is their act born out of delusion. Naturalism is merely the imagination of fools. It has been presented only to destroy humans by depriving them of the ultimate goal. Listen to the discussion of the elements of nature and influence that will be given below. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)